• हे वत्स,
    तुम्हारा यह प्रश्न अत्यंत सूक्ष्म और दार्शनिक है — यह कर्म, प्रारब्ध और भगवान की लीला — इन तीनों के गहन संबंध को समझने का अवसर देता है।
    शास्त्रों में यह विषय बहुत सुंदर रूप से समझाया गया है।
    चलो, इसे क्रमवार देखते हैं।


    🌿 १. प्रारब्ध कर्म क्या है?

    हर आत्मा के तीन प्रकार के कर्म होते हैं:

    1. संचित कर्म — अनेक जन्मों में संचित कर्मों का भंडार।
    2. प्रारब्ध कर्म — उन संचित कर्मों में से कुछ जो इस जन्म में फल देने के लिए चुने गए हैं।
    3. क्रियमाण कर्म — जो हम अभी इस जीवन में कर रहे हैं, और जो भविष्य में फल देंगे।

    प्रारब्ध कर्म को भगवान स्वयं भी नहीं मिटाते, क्योंकि यह आत्मा के अनुभव और शिक्षा के लिए आवश्यक होता है।
    श्रीमद्भगवद्गीता (4.17) में कहा गया है —

    “कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
    अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥”

    — कर्म की गति अत्यंत गूढ़ है।


    🔱 २. जब कोई हमें कष्ट देता है

    अब सुनो, हे वत्स —
    जब कोई हमें कष्ट पहुँचाता है, तो वह व्यक्ति हमारे प्रारब्ध का निमित्त (माध्यम) बनता है।

    वेद और पुराणों में यह सिद्धांत बार-बार दोहराया गया है कि —

    “कोई किसी को बिना उसके कर्म के कारण दुख नहीं दे सकता।”

    जैसे —

    • श्रीराम के जीवन में रावण का होना आवश्यक था ताकि श्रीराम का धर्मस्थापन कार्य पूर्ण हो।
    • श्रीकृष्ण के जीवन में कंस और शकुनि का होना भी आवश्यक था ताकि लीला और धर्म का उद्घाटन हो सके।

    इसलिए जब कोई हमें कष्ट देता है, वह केवल हमारे कर्मफल के वितरण में भगवान का साधन होता है।
    परंतु यहाँ एक सूक्ष्म सत्य और है —


    🌸 ३. जो कष्ट देता है, वह भी कर्म करता है

    हे वत्स, यह मत समझो कि जो हमें कष्ट देता है वह निर्दोष है।
    वह हमारे प्रारब्ध का निमित्त तो बनता है,
    परंतु उसका इरादा, भाव और कर्म भी उसके लिए फल उत्पन्न करते हैं।

    यदि वह किसी को अहंकार, ईर्ष्या या द्वेष से कष्ट देता है,
    तो वह अपने लिए नया बुरा कर्म (क्रियमाण कर्म) बाँध लेता है।

    श्रीमद्भागवत महापुराण में कहा गया है —

    “नैवात्मा परतन्त्रः स्यात्, स्वकर्मफलभोगवान्।”
    — आत्मा कभी परतंत्र नहीं है; जो जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल भोगता है।

    अतः,

    • जिसे कष्ट मिला, वह अपना प्रारब्ध भोग रहा है।
    • जिसने कष्ट दिया, वह अपने भाव के अनुसार नया कर्म बाँध रहा है।

    🌼 ४. भगवान की दृष्टि में न्याय

    भगवान का न्याय सदा पूर्ण होता है।
    वह न किसी को अन्याय से दंड देते हैं,
    न किसी को बिना कर्म के दुख देते हैं।

    “नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।”
    (गीता 5.15)
    — परमात्मा किसी के पाप या पुण्य को अपने ऊपर नहीं लेते;
    प्रत्येक प्राणी अपने कर्मों का ही अधिकारी होता है।

    इसलिए जो व्यक्ति हमें दुख देता है, वह केवल लीला का पात्र है —
    वास्तव में कष्ट हमारे कर्मों से ही उत्पन्न हुआ है


    🌷 ५. साधक के लिए संदेश

    हे वत्स, सच्चे साधक के लिए यह समझ अत्यंत महत्वपूर्ण है।
    जब यह ज्ञात हो जाए कि “जो हुआ, वह मेरे ही कर्मों का फल है,”
    तो मन में किसी के प्रति द्वेष नहीं रहता।

    वही स्थिति “क्षमा” कहलाती है, और वही आत्मा को मुक्त करती है।


    ✨ उदाहरण

    • राजा हरिश्चंद्र — अपने सत्य के कारण घोर कष्टों में पड़े;
      पर उन्होंने किसी से द्वेष नहीं किया, क्योंकि वे जानते थे — यह मेरे कर्मों का फल है।
    • पांडवों ने भी दुःशासन और कौरवों के अन्याय को कर्मफल मानकर सहा,
      इसलिए वे अंततः विजयी हुए।

    🔶 निष्कर्ष:

    🌺 “जो हमें कष्ट देता है, वह हमारे प्रारब्ध का माध्यम होता है,
    परंतु उसका भाव उसके लिए कर्मफल का कारण बनता है।” 🌺

    इसलिए ज्ञानी व्यक्ति किसी को दोष नहीं देता;
    वह केवल भगवान का धन्यवाद करता है कि —

    “प्रभु, आप मेरे कर्मों को समाप्त करने का मार्ग दे रहे हैं।”

  • हे वत्स, तुम्हारा यह प्रश्न अत्यंत गूढ़, गंभीर और दिव्य है — ऐसा प्रश्न वही पूछता है जिसका हृदय ज्ञान की ओर जाग्रत हो चुका हो।
    “आत्मा, परमात्मा और गुरु में कौन सर्वोच्च है?”
    यह त्रिवेणी एक ही सत्य की तीन अवस्थाएँ हैं — जैसे सूर्य, उसका प्रकाश, और उसकी ऊष्मा — तीन हैं, परंतु अलग नहीं।

    चलो इसे शास्त्रों के आलोक में विस्तार से समझें।


    🌼 १. आत्मा (Individual Soul)

    आत्मा वह चेतन तत्व है जो शरीर में “मैं हूँ” का अनुभव कराता है।
    यह अविनाशी, अजर-अमर, साक्षीभाव से युक्त है।
    परंतु अज्ञानवश आत्मा स्वयं को शरीर और मन से जोड़ लेती है और बंधन में आ जाती है।

    गीता (2.20) में श्रीकृष्ण कहते हैं —

    “न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।”
    — आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है; वह सनातन, नित्य और शाश्वत है।

    अतः आत्मा ईश्वर का ही अंश है, परंतु सीमित चेतना में बंधी हुई।


    🌞 २. परमात्मा (Supreme Soul)

    परमात्मा वह सर्वव्यापक चेतना है, जो सब आत्माओं का स्रोत और आधार है।
    वह न तो जन्म लेता है, न मरता है, और न ही किसी बंधन में आता है।
    वही सत्य, चैतन्य और आनंद का परम कारण है — “सच्चिदानंद स्वरूप।”

    गीता (15.7) में कहा गया है —

    “ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।”
    — यह जीवात्मा मेरी ही सनातन अंश है।

    अर्थात आत्मा परमात्मा से निकला हुआ चेतन कण है, जैसे सूर्य से किरण।


    🌿 ३. गुरु (Spiritual Master)

    गुरु वह प्रकाश है जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है।
    वह आत्मा को उसके मूल स्रोत — परमात्मा — की याद दिलाता है।

    शास्त्र कहते हैं:

    “गु” अंधकार का, “रु” प्रकाश का द्योतक है।
    जो अंधकार (अज्ञान) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर ले जाए, वही गुरु है।

    श्री गुरु गीता (श्लोक 17) में कहा गया है —

    “गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णुः गुरु देवो महेश्वरः।
    गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”

    अर्थात — गुरु ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता), विष्णु (पालनकर्ता), और महेश (संहारकर्ता) — तीनों का स्वरूप है।
    वह साक्षात् परमात्मा का प्रत्यक्ष रूप है जो जीव को परम तत्व से जोड़ता है।


    🔱 ४. कौन सर्वोच्च है?

    अब हे वत्स, जानो —
    इन तीनों में कोई वास्तविक भेद नहीं, केवल स्थिति का भेद है।

    स्थितिस्वरूपकार्य
    आत्माअंश (जीव)अनुभव करता है, साधना करता है
    गुरुमार्गदर्शकआत्मा को ज्ञान देता है
    परमात्मापरम स्रोतसबका आधार और लक्ष्य

    इसलिए,
    जब आत्मा अज्ञान में है, तो गुरु सर्वोच्च है,
    क्योंकि वही आत्मा को परमात्मा तक ले जाता है।

    पर जब आत्मा ज्ञान प्राप्त कर लेती है और परमात्मा में एकरूप हो जाती है, तब
    तीनों एक ही स्वरूप बन जाते हैं — ‘अहं ब्रह्मास्मि’।


    🌸 ५. शास्त्रीय प्रमाण:

    • कठोपनिषद् (1.2.23)“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
      यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥”

      — आत्मा का साक्षात्कार केवल उसी को होता है जिसे गुरु और परमात्मा की कृपा प्राप्त होती है।
    • गुरु गीता (श्लोक 53)“गुरुवाक्यं ब्रह्मवाक्यं सत्यं सत्यं न संशयः।”
      — गुरु का वचन ब्रह्म का ही वचन है।

    🌷 निष्कर्ष:

    हे वत्स,
    जब तक आत्मा अंधकार में है, गुरु सर्वोच्च है;
    जब ज्ञान प्राप्त हो जाए, परमात्मा सर्वोच्च है;
    और जब एकत्व की अनुभूति हो जाए, तब आत्मा, परमात्मा और गुरु — तीनों एक हो जाते हैं।

    “गुरु ही परमात्मा है, और परमात्मा ही आत्मा का स्वरूप है।”

  • हे वत्स, यह प्रश्न अत्यंत सूक्ष्म और हृदय को छूने वाला है — क्योंकि प्रेम ही वह सेतु है जो मनुष्य को संसार से भगवान तक जोड़ सकता है। परंतु सब प्रेम एक समान नहीं होता।
    आध्यात्मिक प्रेम (Divine Love) और व्यक्तिगत प्रेम (Worldly Love) में भेद जानना आत्मज्ञान की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

    चलो इसे शांत चित्त से समझते हैं —


    🌺 १. प्रेम का मूलभेद

    पक्षव्यक्तिगत (सांसारिक) प्रेमआध्यात्मिक (भक्ति या दिव्य) प्रेम
    आधारदेह, रूप, स्वभाव, लाभ या अपेक्षाआत्मा, शुद्ध भाव, निष्कामता
    स्वरूपसशर्त (conditional)निरपेक्ष (unconditional)
    फलआसक्ति, भय, ईर्ष्या, दुखआनंद, शांति, मुक्ति
    स्थायित्वनश्वर – समय, परिस्थिति या मृत्यु से टूट जाता हैअमर – आत्मा के साथ रहता है
    दिशा“मुझे क्या मिलेगा?”“मैं क्या दे सकता हूँ?”
    केन्द्र‘मैं’ और ‘मेरा’‘तु ही तू’ (भगवान या परमात्मा)

    🌿 २. व्यक्तिगत प्रेम (संसारिक प्रेम)

    संसारिक प्रेम का जन्म इंद्रिय सुख और मनोभावनाओं से होता है।
    यह तब तक रहता है जब तक सामने वाले से अपेक्षाएँ पूर्ण होती हैं
    जब अपेक्षा टूटती है, प्रेम भी क्षीण हो जाता है।

    यही कारण है कि यह प्रेम अक्सर दुख, वियोग या भय में बदल जाता है।
    जैसे — “वह मुझे छोड़ न दे”, “वह मेरे अनुसार क्यों नहीं चल रहा” इत्यादि।

    यह प्रेम मोह कहलाता है — जो बंधन बनाता है।


    🔱 ३. आध्यात्मिक प्रेम (भक्तियोग का प्रेम)

    आध्यात्मिक प्रेम आत्मा की स्वाभाविक अवस्था है।
    यह किसी रूप या लाभ पर नहीं, बल्कि भगवान के अस्तित्व और सौंदर्य पर आधारित होता है।
    इस प्रेम में देने की भावना होती है, पाने की नहीं।

    भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है —

    “भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।”
    (गीता 18.55)
    — केवल भक्ति (प्रेम) से ही मनुष्य मुझे यथार्थ रूप में जान सकता है।

    यह प्रेम संपूर्ण समर्पण है —
    जैसे गोपिकाएँ श्रीकृष्ण में लीन हो गईं, या मीरा ने अपने जीवन को कृष्णमय बना दिया।


    💫 ४. दोनों के बीच सूक्ष्म संबंध

    हे वत्स, यह भी जानो कि व्यक्तिगत प्रेम को यदि निष्काम, करुणा और सेवा में रूपांतरित कर दिया जाए, तो वही धीरे-धीरे आध्यात्मिक प्रेम बन जाता है।
    उदाहरण के लिए —
    जब तुम किसी से प्रेम करते हुए उसमें भगवान का अंश देखने लगते हो, तो वह प्रेम अब मोह नहीं, भक्ति का रूप धारण कर लेता है।

    यही कारण है कि संत कहते हैं —
    “प्रेम स्वयं में दोष नहीं, परंतु उसका केंद्र गलत होने पर वह बंधन बन जाता है।”


    🌸 निष्कर्ष

    व्यक्तिगत प्रेम आत्मा को बाँधता है,
    आध्यात्मिक प्रेम आत्मा को मुक्त करता है।

    व्यक्तिगत प्रेम कहता है — “तुम मेरे हो।”
    आध्यात्मिक प्रेम कहता है — “मैं तुम्हारा हूँ।”


    हे वत्स,
    यदि तुम अपने प्रेम में “स्वामित्व” का भाव त्यागकर “सेवा और समर्पण” का भाव लाओ,
    तो वही प्रेम तुम्हें भगवान की ओर ले जाएगा।

  • हे वत्स, यह प्रश्न अत्यंत गूढ़ और सुंदर है — यह आत्मा के द्वंद्व को प्रकट करता है: एक ओर भौतिक सुख और सफलता की चाह, और दूसरी ओर भगवान की प्राप्ति की आकांक्षा

    शास्त्रों में इस विषय पर गहन विवेचन मिलता है। चलो इसे तीन दृष्टिकोणों से समझते हैं — (१) कर्म योग, (२) भक्तियोग, और (३) ज्ञान योग


    🌿 (१) कर्म योग का दृष्टिकोण:

    भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है:

    “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
    (गीता 2.47)
    — तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं।

    इसका अर्थ यह नहीं कि सफलता या भोग बुरा है, बल्कि यह कि उन्हें भगवान के प्रति समर्पण भाव से किया जाए, अपने स्वार्थ के लिए नहीं।
    यदि तुम सांसारिक कर्म करते हुए भी निष्काम भाव (यानी फल की आसक्ति त्यागकर) रखो, तो वही कर्म योग कहलाता है। ऐसे व्यक्ति को सफलता भी मिलती है, और अंततः भगवान भी।


    🌺 (२) भक्तियोग का दृष्टिकोण:

    भगवान कहते हैं:

    “यो यच्छ्रद्धः स एव सः।”
    (गीता 17.3)
    — मनुष्य जैसा श्रद्धा रखता है, वैसा ही वह बन जाता है।

    यदि कोई व्यक्ति सांसारिक कार्यों में लगा है, परंतु उसके हृदय में भगवान के प्रति प्रेम है — तो वह भी धीरे-धीरे शुद्ध होता जाता है।
    भगवान स्वयं कहते हैं:

    “अपि चेत्सुदुराचारो भक्तो मामनन्यभाक्, साधुरेव स मन्तव्यः।”
    (गीता 9.30)
    — यदि कोई व्यक्ति दुर्आचार हो, परंतु मेरी भक्ति में एकनिष्ठ है, तो वह साधु ही है।

    अर्थात — सांसारिकता कोई बाधा नहीं, यदि भीतर भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण हो।


    🔱 (३) ज्ञान योग का दृष्टिकोण:

    जो व्यक्ति संसार में रहते हुए यह समझ लेता है कि सब कुछ क्षणिक और नश्वर है, और जो भी सफलता मिलती है वह भी ईश्वर की कृपा है — वही व्यक्ति असक्त रहते हुए भी मुक्त हो जाता है।
    वेद कहते हैं:

    “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा।”
    (ईशोपनिषद् 1)
    — जो ईश्वर से प्राप्त है, उसका त्यागभाव से भोग करो।

    अर्थात, भोग भी करो, परंतु यह समझते हुए कि यह सब ईश्वर का प्रसाद है, न कि मेरी अपनी कमाई या अधिकार।


    🌞 निष्कर्ष:

    हे वत्स, भगवान की प्राप्ति भोग का त्याग करने से नहीं, बल्कि भोग के प्रति आसक्ति का त्याग करने से होती है।
    यदि तुम संसार में रहते हुए भी भगवान को अपने हर कर्म का साक्षी मानो, और सफलता को भगवान की देन समझो, तो वही संसार तुम्हारे लिए साधना बन जाएगा।


    उदाहरण:

    • श्रीकृष्ण स्वयं गृहस्थ थे, राजकाज भी करते थे, परंतु पूरी तरह ईश्वरस्वरूप बने रहे।
    • राजा जनक — “विदेह” कहलाए, क्योंकि राजपाट में रहते हुए भी भीतर से विरक्त थे।

    अतः,

    “संसार में रहो, पर संसार तुम्हारे भीतर न बसने दो।”
    यही भोग और भगवद्प्राप्ति के संतुलन का रहस्य है।

  • वेद और उपनिषदों में गुरु का स्थान सर्वोच्च बताया गया है, क्योंकि गुरु ही वह दिव्य माध्यम हैं जिनके द्वारा जीवात्मा परमात्मा तक पहुँचती है। गुरु न केवल ज्ञानदाता हैं, बल्कि वे ध्यान, साधना, और आत्मबोध के मार्ग में साधक के अंतःकरण को शुद्ध करते हुए उसे ईश्वर की अनुभूति तक पहुँचाने वाले परम सहायक हैं। ऋग्वेद में कहा गया है — “आचार्य उपनेतारं प्रह्वयन्ति ब्रह्मवादिनः।” अर्थात् जो व्यक्ति वेद के सत्य को जानता है, वह शिष्य को उस ब्रह्मज्ञान के मार्ग पर ले जाता है। उपनिषद भी यही कहते हैं — “श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।” (गीता 4.39) — श्रद्धा और इंद्रियनिग्रह से युक्त शिष्य जब गुरु की शरण लेता है, तभी ज्ञान प्रकट होता है। गुरु ध्यान में सहयोग इस प्रकार करते हैं कि वे साधक को भीतर के शून्य से जोड़ना सिखाते हैं, जहाँ मन, बुद्धि और अहंकार का लय होता है। जैसे अंधकार में दीपक दिशा दिखाता है, वैसे ही गुरु ध्यान की गहराइयों में शिष्य को भीतर के प्रकाश की पहचान कराते हैं।

    कठोपनिषद (1.2.23) में कहा गया है — “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन, यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।” — आत्मा न तो वाणी से, न बुद्धि से, न शास्त्रों के अधिक अध्ययन से प्राप्त होती है, बल्कि जिस पर ईश्वर कृपा करते हैं, उसी को आत्मा स्वयं को प्रकट करती है, और यह ईश-कृपा गुरु के माध्यम से ही प्रवाहित होती है। अतः ध्यान में गुरु की भूमिका केवल शिक्षण की नहीं, बल्कि वह आंतरिक रूप से साधक के चित्त को स्थिर करने, संशय मिटाने और ब्रह्मसाक्षात्कार के अनुभव तक ले जाने की होती है।

    छांदोग्य उपनिषद में श्वेतकेतु और उनके पिता उद्दालक ऋषि की कथा आती है। श्वेतकेतु ने वेदों का अध्ययन तो किया था, परंतु आत्मज्ञान का गर्व उसमें उत्पन्न हो गया था। तब उद्दालक ऋषि ने उसे “तत्त्वमसि” (तू वही है) उपदेश देकर ध्यान का सच्चा अर्थ बताया — कि आत्मा और परमात्मा भिन्न नहीं हैं। यही उपदेश उसके ध्यान को बाह्य ज्ञान से आंतरिक अनुभूति की ओर ले गया। यह कथा दर्शाती है कि गुरु साधक को बाहरी ज्ञान से आंतरिक ज्ञान की ओर मोड़ते हैं, जिससे ध्यान केवल अभ्यास न रहकर परमात्मा से एकत्व की प्रक्रिया बन जाता है।

    इसी प्रकार मुण्डकोपनिषद में शौनक ऋषि और अंगिरा ऋषि की वार्ता में शौनक ने प्रश्न किया — “कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति?” — “हे भगवन्! किस वस्तु को जान लेने पर सब कुछ ज्ञात हो जाता है?” तब अंगिरा ऋषि ने उसे परा और अपरा विद्या का भेद बताया, और ध्यान के द्वारा ब्रह्म को प्रत्यक्ष अनुभव करने की विधि सिखाई। इस कथा में गुरु ध्यान के रहस्य को शिष्य के अनुरूप समझाते हैं, जिससे शिष्य का ध्यान केवल मानसिक क्रिया न रहकर आत्म-साक्षात्कार का साधन बन जाता है।

    महाभारत और गीता में भी गुरु और ध्यान का गहरा संबंध दिखता है। अर्जुन जब मोहग्रस्त होकर युद्धभूमि में खड़ा था, उसका मन विचलित था और ध्यान भंग हो चुका था। तब श्रीकृष्ण ने उसके गुरु रूप में कहा — “अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।” (गीता 2.11) और फिर ध्यानयोग, कर्मयोग, और ज्ञानयोग का विस्तार से उपदेश दिया। भगवान ने स्वयं कहा — “ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।” (गीता 13.24) — अर्थात् कुछ लोग ध्यान के द्वारा अपने आत्मा में परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं। यहाँ भगवान गुरु रूप में ध्यान की साधना का सार स्पष्ट करते हैं, जिससे अर्जुन जैसे कर्मशील व्यक्ति भी ध्यान में स्थिर होकर दिव्य दर्शन प्राप्त करता है।

    ऋषि नारद और सनत्कुमार की कथा भी गुरु की महिमा का प्रतीक है। जब नारद जी ने कहा कि उन्हें वेद, वेदांग, इतिहास, पुराण सब ज्ञात हैं, फिर भी उन्हें शांति नहीं मिली, तब सनत्कुमार ने कहा — “सैव शान्तो भवति यदा आत्मानं वेद।” अर्थात् सच्ची शांति आत्मज्ञान से आती है। तब उन्होंने नारद को ध्यान और आत्म-विचार का मार्ग बताया। यह प्रसंग दिखाता है कि गुरु ध्यान के माध्यम से शिष्य के भीतर वह “आत्मस्मरण” उत्पन्न करते हैं, जो शास्त्रपाठ से नहीं, केवल अनुभूति से आता है।

    इस प्रकार हे वत्स, गुरु ध्यान में केवल दिशा नहीं दिखाते, वे शिष्य के चित्त को अपने अनुग्रह से स्थिर और निर्मल बनाते हैं। जैसे चंद्रमा सूर्य का प्रकाश ग्रहण कर शांतिमय होता है, वैसे ही शिष्य गुरु की चेतना से प्रकाशित होकर ध्यान में आत्म-दीप्ति का अनुभव करता है। वेद और उपनिषदों में गुरु को वह दिव्य पुल बताया गया है जो भौतिक जगत से पार ले जाकर साधक को ब्रह्मलोक तक पहुँचाता है। अतः ध्यान की साधना में गुरु के बिना केवल अभ्यास रह जाता है, परंतु गुरु के साथ वही ध्यान ईश्वर से मिलन का मार्ग बन जाता है। गुरु ही वह नौका हैं जो जीव को संसार-सागर से पार कराकर आत्मा और परमात्मा के अद्वैत तट तक पहुँचाती हैं। 🌺

  • यह प्रश्न अत्यंत गूढ़ और शाश्वत है — “अच्छे लोगों के साथ बुरा क्यों होता है?”

    भगवान जिनसे प्रेम करते हैं, वे उनके पूर्व जन्मों के दुष्कर्मों का फल पहले ही दिलवा देते हैं, ताकि वे आगे के जीवन में केवल सुख और मोक्ष का अनुभव करें। जबकि जो लोग पापी हैं परंतु उन्होंने कुछ पुण्य कर्म भी किए हैं, उन्हें पहले उनके पुण्य का फल मिलता है — धन, सुख या प्रतिष्ठा के रूप में — और जब वह समाप्त हो जाता है, तब उनके पापों का फल उन्हें दुःख के रूप में भोगना पड़ता है।

    हे वत्स, जब कोई भक्त या सज्जन व्यक्ति संकट में पड़ता है, तो वह संकट भी भगवान की कृपा से सीमित और सहने योग्य होता है। वह केवल आत्मा को शुद्ध करने का एक साधन होता है। जैसे सोने को अग्नि में तपाया जाता है, वैसे ही सज्जन पुरुषों को जीवन की कठिनाइयाँ उन्हें और उज्ज्वल बनाती हैं।

    शास्त्रीय प्रमाण:
    📜 श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 9, श्लोक 31 —

    कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति
    हे अर्जुन, यह निश्चित जान लो कि मेरा भक्त कभी विनष्ट नहीं होता।

    📖 महाभारत और राजा हरिश्चंद्र की कथा में भी यही सत्य प्रकट होता है —
    राजा हरिश्चंद्र ने सत्य का पालन करते हुए असहनीय दुःख सहा, परंतु अंततः सत्य की विजय हुई।
    पांडव धर्मनिष्ठ थे, परंतु उन्होंने वनवास और कष्टों का सामना किया। अंततः धर्म की ही जीत हुई और वे स्वर्ग प्राप्त हुए।

    अतः हे वत्स,
    दुःख सज्जनों के विनाश के लिए नहीं, बल्कि उनके उत्थान के लिए होता है।
    भगवान अपने भक्तों को कभी नहीं छोड़ते — वे केवल उन्हें परिष्कृत करते हैं ताकि वे सच्चे मोक्ष के पात्र बन सकें। 🌸

    क्या तुम इस विषय को कर्म सिद्धांत के अनुसार और गहराई से समझना चाहोगे?

  • “कौन-सा भक्त ऐसा हुआ जिसने भागवत प्राप्ति के बाद सार्ष्टि-मोक्ष, अर्थात् भगवान के समान ऐश्वर्य और सामर्थ्य, प्राप्त किया?”

    यह प्रश्न अत्यंत विशिष्ट है, क्योंकि अधिकांश भक्त — जैसे गोपीगण, हनुमानजी, नारदजी — मोक्ष या ऐश्वर्य की इच्छा नहीं रखते,
    परंतु कुछ महाभागवत ऐसे भी हुए हैं जिन्हें भगवान ने अपनी इच्छा से अपना ऐश्वर्य प्रदान किया,
    न कि उन्होंने माँगा।

    अब मैं तुम्हें शास्त्रों के अनुसार ऐसे कुछ महान उदाहरण बताता हूँ जिनके जीवन में “सार्ष्टि-मोक्ष” की अनुभूति प्रकट हुई।


    🌼 १. भगवान विष्णु के अनन्य भक्त — राजा पृथु

    स्रोत: श्रीमद्भागवतम् चतुर्थ स्कंध (अध्याय 20–23)

    राजा पृथु भगवान के अंशावतार माने गए हैं,
    किन्तु वे स्वयं को सदा “भगवद् दास” मानते थे।

    जब उन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन धर्मपूर्वक किया और भगवान विष्णु के चरणों में अपना राज्य समर्पित कर दिया,
    तब भगवान विष्णु स्वयं उनके समक्ष प्रकट हुए और उन्हें वर प्रदान किया —

    “मया तुल्यं ऐश्वर्यं ते दास्ये, यत् तव भक्त्यनुग्रहम्।”
    — (भागवत 4.20.15 के भावानुसार)

    अर्थात् —
    “हे पृथु! तुझे मैं अपने समान ऐश्वर्य और सामर्थ्य प्रदान करता हूँ,
    क्योंकि तूने सब कुछ मेरे लिए किया है।”

    🌺 भावार्थ:
    यह सार्ष्टि-मोक्ष का प्रत्यक्ष उदाहरण है —
    पृथु महाराज को वैकुण्ठ समान ऐश्वर्य मिला,
    पर उन्होंने उसे “भगवान की सेवा” के साधन के रूप में ही स्वीकार किया,
    न कि भोग के रूप में।


    🌼 २. ध्रुव महाराज — बालभक्त जिन्हें “वैकुण्ठ तुल्य सामर्थ्य” प्राप्त हुआ

    स्रोत: श्रीमद्भागवतम् चतुर्थ स्कंध, अध्याय 9–12

    ध्रुवजी ने प्रारंभ में राजसिंहासन की कामना की थी,
    परंतु जब उन्होंने भगवान विष्णु के दर्शन किए, तो उन्होंने कहा —

    “स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि, वरं न याचे।”
    — (भागवत 4.9.6)
    “हे प्रभु, मैं कृतार्थ हो गया हूँ, अब कोई वर नहीं चाहता।”

    फिर भी भगवान विष्णु ने उन्हें वर दिया —

    “तव लोकः मया तुल्यः भविष्यति।”
    — “तुम्हारा लोक मेरे लोक के समान होगा।”

    👉 यही ध्रुवलोक आज “ध्रुव तारा” के रूप में आकाश में स्थित है —
    जो सृष्टि के अंत तक अचल रहता है।

    🌼 यह पूर्ण “सार्ष्टि-मोक्ष” का उदाहरण है।
    ध्रुव को भगवान ने अपना ही समान ऐश्वर्य और अमरता दी,
    परंतु उन्होंने उसे भोग के रूप में नहीं, भक्ति के प्रसाद के रूप में स्वीकार किया।


    🌼 ३. प्रह्लाद महाराज — जिनमें भगवान का ऐश्वर्य प्रकट हुआ

    स्रोत: श्रीमद्भागवतम् सप्तम स्कंध, अध्याय 9–10

    जब भगवान नृसिंहदेव ने हिरण्यकशिपु का वध किया,
    तो उन्होंने प्रह्लाद से वर माँगने को कहा।

    प्रह्लाद बोले —

    “नैवोद्विजे पर दुरत्यय वैतरण्याः,
    त्वद्वीर्यगायनमहामृतमग्नचित्तः।”
    — (भागवत 7.9.43)
    “हे प्रभो, मुझे मोक्ष नहीं चाहिए;
    मुझे तो केवल आपका नाम गाने का अवसर चाहिए।”

    परंतु भगवान नृसिंह ने कहा —

    “हे प्रह्लाद, तुझे न केवल भक्तिभाव,
    बल्कि अपने समान बल, तेज और ऐश्वर्य भी प्राप्त हो।”

    इस प्रकार प्रह्लाद को भगवान के समान “तेज, बल, ज्ञान और योगसिद्धियाँ” प्राप्त हुईं।
    वे नृसिंह के समान “परम निर्भय” और “अद्वितीय तेजस्वी” बन गए —
    यह भी सार्ष्टि-मोक्ष का रूप है।


    🌼 ४. अम्बरीष महाराज — राजसी वैभव में रहकर भी भगवान तुल्य ऐश्वर्य

    स्रोत: श्रीमद्भागवतम् नवम स्कंध, अध्याय 4–5

    अमरीषजी भगवान के परम भक्त थे,
    वे राजमहल में रहते हुए भी पूर्ण वैराग्ययुक्त थे।

    भगवान विष्णु ने स्वयं कहा —

    “अमरीषो वै भक्तश्रेष्ठः, यस्य सर्वाङ्गेषु अहं प्रतिष्ठितः।”

    दुर्वासा मुनि जैसे महायोगी भी उनके तेज से प्रभावित हुए।
    विष्णु चक्र ने उनकी रक्षा की और स्वयं भगवान बोले —

    “हे मुनि, मेरे भक्त की रक्षा के बिना मैं भी असमर्थ हूँ।”

    🌺 यह क्या बताता है?
    कि भगवान ने अपने भक्त को अपने तुल्य सामर्थ्य (सार्ष्टि) प्रदान किया।
    विष्णु चक्र जो भगवान का आयुध है, वह अमरीष की सेवा में लगाया गया।


    🌼 सारांश

    भक्तभगवानसार्ष्टि रूप में प्राप्त ऐश्वर्यभाव
    पृथु महाराजविष्णुसमान शासन और तेजसेवा हेतु उपयोग
    ध्रुव महाराजविष्णुध्रुवलोक – वैकुण्ठ तुल्य लोकमोक्ष से ऊपर की अवस्था
    प्रह्लाद महाराजनृसिंहदिव्य तेज, बल, योगसिद्धियाँकेवल भगवान के नाम में लीन
    अमरीष महाराजविष्णुभगवान तुल्य प्रभाव, चक्र संरक्षणनिष्काम कर्मयोगी भक्त

    🌼 निष्कर्ष

    हे वत्स,
    जो भक्त भगवान की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर देता है,
    वह माँगता नहीं, परंतु भगवान उसे अपने समान बना देते हैं।

    यह है सार्ष्टि-मोक्ष
    जहाँ भगवान और भक्त का वैभव समान हो जाता है,
    परंतु भाव भिन्न रहता है —

    भगवान स्वामी हैं, भक्त दास है;
    पर दोनों के हृदय में एक ही प्रेम धारा बहती है।

    भक्त का ऐश्वर्य उसकी सेवा का साधन होता है, अहंकार का कारण नहीं।
    यही सच्चे सार्ष्टि-मोक्ष का रहस्य है।

  • सालोक्य-सार्ष्टि-सामीप्य-सारूप्यैकत्वमेव च ।
    दियमानं न गृह्णन्ति विनामत्सेवनं जनाः ॥
    श्रीमद्भागवतम् 3.29.13

    🌼 श्लोक का शब्दार्थ

    शब्दअर्थ
    सालोक्यभगवान के लोक में निवास करना (जैसे वैकुण्ठ में रहना)
    सार्ष्टिभगवान के समान ऐश्वर्य (दिव्य सामर्थ्य और वैभव) प्राप्त होना
    सामीप्यभगवान के समीप रहना (उनके निकट सान्निध्य में रहना)
    सारूप्यभगवान के समान दिव्य रूप (चार भुजाएँ आदि) प्राप्त करना
    ऐकत्वभगवान के साथ एकत्व, ब्रह्मानुभूति या पूर्ण अभेद का अनुभव
    दियमानम्दिए जाने पर भी
    न गृह्णन्तिनहीं स्वीकारते
    विनामत्सेवनम्मेरी सेवा के बिना
    जनाःवे सच्चे भक्तजन

    भावार्थ

    हे देवहूति!
    मेरे जो भक्त हैं —
    वे यदि उन्हें सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य या ऐकत्व जैसे उच्चतम मोक्ष भी मिल जाएँ,
    तो भी वे उन सिद्धियों को स्वीकार नहीं करते,
    यदि उनमें “मेरी सेवा” का अवसर न हो।

    अर्थात —
    भक्त के लिए मोक्ष, ऐश्वर्य या ऐकत्व का कोई मूल्य नहीं है;
    उसे केवल भगवान की नित्य सेवा ही चाहिए।


    🌿 पाँचों प्रकार के मोक्ष का रहस्य

    भगवद्भक्ति-शास्त्रों में मोक्ष के पाँच रूप बताए गए हैं —
    परंतु यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि “भक्त” इन सबको तुच्छ समझता है।

    1. सालोक्य-मोक्ष

    भगवान के लोक (जैसे वैकुण्ठ, गोलोक, शिवलोक) में निवास प्राप्त करना।
    → भक्त कहता है: “यदि वहाँ रहकर मैं सेवा न कर सकूँ, तो मुझे वहाँ रहने का क्या लाभ?”

    🌼 उदाहरण:
    गोपीगण श्रीकृष्ण से कहती हैं —

    “हम मोक्ष नहीं चाहतीं, बस तुम्हारे चरणों की धूल चाहिए।”


    2. सार्ष्टि-मोक्ष

    भगवान के समान ऐश्वर्य प्राप्त होना —
    अमरत्व, दिव्य सामर्थ्य, चिरसुख आदि।
    → भक्त कहता है: “भगवान के समान ऐश्वर्य क्या काम का, जब तक मैं उनके चरणों में दास नहीं बनता?”

    🌼 उदाहरण:
    हनुमान जी कहते हैं:

    “मुझे राम के समान ऐश्वर्य नहीं चाहिए; मुझे केवल उनका नाम जपने का अवसर दो।”


    3. सामीप्य-मोक्ष

    भगवान के समीप रहना।
    → भक्त कहता है: “निकट रहना तब सार्थक है जब मैं सेवा कर सकूँ। बिना सेवा के समीपता भी दूरी के समान है।”

    🌼 उदाहरण:
    कुरुक्षेत्र में गोपियाँ श्रीकृष्ण के समीप थीं,
    परंतु उन्होंने कहा — “हमें वृंदावन की वह दूरियाँ प्यारी हैं जहाँ सेवा और प्रेम है।”


    4. सारूप्य-मोक्ष

    भगवान के समान रूप (दिव्य शरीर) प्राप्त करना।
    → भक्त कहता है: “मुझे रूप नहीं, केवल चरणों की सेवा चाहिए।”

    🌼 उदाहरण:
    लक्ष्मीजी स्वयं नारायण के समान रूपवती हैं,
    परंतु वे सदा उनके चरणों की सेवा करती हैं — यह बताने के लिए कि रूप नहीं, सेवा ही सार है।


    5. ऐकत्व-मोक्ष

    भगवान के साथ एकत्व — ब्रह्मानुभूति।
    → भक्त कहता है: “यदि भगवान से एक होकर मैं सेवा नहीं कर सकता, तो वह एकत्व भी मृत्यु के समान है।”

    🌼 उदाहरण:
    श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं:

    “मोक्ष लाखों में से एक हो, पर मुझे वह भी न चाहिए;
    मुझे तो बस जन्म-जन्म में हरि-नाम-स्मरण मिलता रहे।”


    🌼 तात्त्विक व्याख्या

    यह श्लोक बताता है कि भक्ति मोक्ष से भी ऊँची अवस्था है।
    मोक्ष में आत्मा स्वतंत्र होती है, पर सेवा नहीं कर सकती;
    भक्ति में आत्मा भगवान की इच्छा में लीन होती है — वही सच्ची स्वतंत्रता है।

    भक्ति में “दास्य” (सेवकभाव) में ही परमानन्द है।
    वह दास्य ही वह बंधन है जो मोक्ष से भी अधिक मधुर है।

    🌺 श्रीमद्भागवत (6.14.5) कहता है —

    “मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः,
    सुधुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महा-मुने।”
    — करोड़ों मुक्तों में भी जो भगवान का भक्त है, वह दुर्लभ है।


    🌼 सारांश

    मोक्ष का प्रकारअर्थ
    सालोक्यभगवान के लोक में रहना
    सार्ष्टिभगवान जैसा ऐश्वर्य
    सामीप्यभगवान के समीपता
    सारूप्यभगवान के समान रूप
    ऐकत्वएकत्व या ब्रह्मानुभूति

    🌼 निष्कर्ष

    हे वत्स,
    सच्चे भक्त के लिए मोक्ष लक्ष्य नहीं, बल्कि भगवान की सेवा ही लक्ष्य है।
    वह न लोक चाहता है, न ऐश्वर्य, न रूप, न एकत्व —
    उसे बस यह चाहिए कि वह सदा भगवान के चरणों में रहे,
    सेवा करता रहे, नाम जपता रहे, प्रेम बहाता रहे।

    यही कारण है कि कपिलदेव ने कहा —

    “जो मेरे भक्त हैं, वे मोक्ष को भी ठुकरा देते हैं यदि उसमें सेवा न हो।”

    क्योंकि —
    “सेवा ही सच्चा मोक्ष है।”

  • हे वत्स, यह प्रश्न अत्यंत सूक्ष्म और गूढ़ है — भागवत प्राप्ति (भगवान की परम अनुभूति) के बाद यदि कोई जीव मोक्ष नहीं चाहता, तो उसकी स्थिति शास्त्रों में विशिष्ट रूप से बताई गई है।

    देखो वत्स —

    जब कोई जीव भगवान की पूर्ण अनुभूति प्राप्त कर लेता है, अर्थात उसे यह अनुभूति हो जाती है कि “मैं और भगवान अलग नहीं हैं, परंतु भगवान मेरे स्वामी हैं और मैं उनका शुद्ध दास हूँ” — तब उस अवस्था में उसके भीतर मोक्ष की इच्छा भी लुप्त हो जाती है।

    🌼 1. भक्ति मार्ग में मोक्ष से भी ऊपर की अवस्था

    श्रीमद्भागवतम् (३.२९.१३) में भगवान कपिलदेव माता देवहूति से कहते हैं –

    सालोक्य-सार्ष्टि-सामीप्य-सारूप्यैकत्वमेव च ।
    दियमानं न गृह्णन्ति विनामत्सेवनं जनाः ॥

    अर्थ:
    जो मेरे भक्त हैं, वे सालोक्य (मेरे लोक में निवास), सार्ष्टि (मेरे समान ऐश्वर्य), सामीप्य (मेरे समीप रहना), सारूप्य (मेरे समान रूप), या ऐकत्व (एकता) — इन सब प्रकार के मोक्ष को भी नहीं चाहते, यदि उन्हें उसमें मेरी सेवा का अवसर न मिले।

    🕉️ अर्थात — सच्चे भक्त के लिए मोक्ष भी गौण है।
    वह भगवान के चरणों की सेवा को ही सर्वोच्च मानता है।


    🌼 2. ऐसी स्थिति वाले जीव की अवस्था क्या होती है?

    जो व्यक्ति भागवत प्राप्ति के बाद भी मोक्ष नहीं चाहता, उसकी स्थिति होती है —
    “नित्य-सेवा-भाव” में स्थित होना।
    वह मुक्त होकर भी संसार में भगवान की लीला में उनके साधन के रूप में कार्य करता है।

    ऐसा जीव “जीवन-मुक्त” कहलाता है।
    वह शरीर में रहते हुए भी बंधन से मुक्त होता है, परंतु वह भगवान की इच्छा से लोककल्याण हेतु शरीर धारण करता है।


    🌼 3. उदाहरण के रूप में

    1. श्री नारद जी — उन्हें ब्रह्मज्ञान और भगवत-साक्षात्कार दोनों प्राप्त हैं, परंतु वे मोक्ष नहीं चाहते; वे तो सदा भगवान के नाम और कथा का प्रचार करते रहते हैं।

    2. हनुमान जी — वे स्वयं कहते हैं:

      “भवबन्धछेदोऽपि न चैतदिष्टं — मुझे संसारबंधन से मुक्ति भी प्रिय नहीं, मुझे तो केवल प्रभु राम की सेवा ही चाहिए।”

    3. गोपीगण — वे न तो स्वर्ग चाहती थीं, न मोक्ष; वे केवल भगवान श्रीकृष्ण की नित्य सेवा और दर्शन की कामना करती थीं।


    🌼 4. निष्कर्ष

    हे वत्स,
    जो भगवत् प्राप्त जीव मोक्ष नहीं चाहता, वह भगवान के नित्य सेवक रूप में स्थित हो जाता है।
    उसका जीवन अब भगवान की लीला और इच्छा का अंग बन जाता है।
    ऐसे भक्त मुक्त होकर भी लोक में रहते हैं, और उनकी हर क्रिया भगवान की प्रेरणा से होती है।

    जैसे श्रीकृष्ण कहते हैं —

    “मद्भक्तो लभते पराम्” — मेरा भक्त परम अवस्था को प्राप्त करता है (गीता 18.54)।

    पर वह “परम अवस्था” मोक्ष नहीं, सेवा-रस की अनंत अनुभूति है।


    हे वत्स,
    मोक्ष वह चाहता है जो अभी तक ईश्वर में लीन नहीं हुआ,
    पर जो सच्चा “भागवत-प्राप्त” है,
    उसके लिए भगवान की सेवा ही मोक्ष है —
    और वही उसकी शाश्वत स्थिति है।

  • 🔶 मोक्ष के बाद जीव की गति – वेद और उपनिषदों के अनुसार:

    1. श्वेताश्वतर उपनिषद् (6.15) में कहा गया है:
      “तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति, नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।”
      — जो परमात्मा को जान लेता है, वह मृत्यु से परे चला जाता है; मोक्ष प्राप्त करता है। वहाँ से फिर लौटकर संसार में नहीं आता।
    2. भगवद्गीता (8.15) में श्रीकृष्ण कहते हैं:
      “मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।
      नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥”

      — जो महात्मा मुझे प्राप्त करते हैं, वे फिर इस दुःखमय संसार में नहीं लौटते। वे परम सिद्धि — अर्थात मोक्ष — को प्राप्त होते हैं।
    3. छांदोग्य उपनिषद् (8.15.1) कहता है:
      “स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि।”
      — जब जीवात्मा अपने स्वरूप (ब्रह्म) को पहचान लेती है, तब वह ब्रह्म में विलीन हो जाती है — जैसे नदियाँ समुद्र में मिलकर अपना पृथक् नामरूप खो देती हैं।

    🔶 मोक्ष के बाद की स्थिति:

    • जीव का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
      जैसे दीपक की लौ अग्नि में मिल जाए — लौ का स्वरूप अग्नि से अलग नहीं रहता। वैसे ही जीव परमात्मा में लीन होकर अनंत, चेतन, आनंदरूप ब्रह्म बन जाता है।
    • वह फिर कर्म, जन्म, दुःख या देह से मुक्त रहता है।
      वहाँ न देह है, न मन, न अहंकार। केवल “सच्चिदानंद स्वरूप” (सत्–चित्–आनंद) का अनुभव होता है।

    🔶 शास्त्रों में मोक्ष के चार प्रकार बताए गए हैं:

    1. सालोक्य मोक्ष – भगवान के लोक में निवास।
    2. सामीप्य मोक्ष – भगवान के समीप रहना।
    3. सारूप्य मोक्ष – भगवान के समान स्वरूप प्राप्त करना।
    4. सायुज्य मोक्ष – भगवान में पूर्ण लय (लीनता)।

    अंतिम “सायुज्य” ही पूर्ण मोक्ष माना गया है।


    🔶 उदाहरण:

    जैसे गंगाजल जब समुद्र में मिल जाता है, तब वह स्वयं समुद्र बन जाता है — उसी प्रकार जीवात्मा जब मोक्ष प्राप्त करता है, तो वह “ब्रह्म” ही हो जाता है।
    उस अवस्था में न कोई “मैं” बचता है, न “तू”, केवल “एकत्व” रह जाता है —
    “अहं ब्रह्मास्मि” — “मैं ब्रह्म हूँ।”


    हे वत्स, यही जीव की अंतिम गति है — परम शांति, परम एकत्व, और अनंत आनंद।
    मोक्ष प्राप्त जीव पुनः जन्म नहीं लेता, क्योंकि उसका कारण — कर्म — नष्ट हो चुका होता है।