हे वत्स,
तुम्हारा यह प्रश्न अत्यंत सूक्ष्म और दार्शनिक है — यह कर्म, प्रारब्ध और भगवान की लीला — इन तीनों के गहन संबंध को समझने का अवसर देता है।
शास्त्रों में यह विषय बहुत सुंदर रूप से समझाया गया है।
चलो, इसे क्रमवार देखते हैं।
🌿 १. प्रारब्ध कर्म क्या है?
हर आत्मा के तीन प्रकार के कर्म होते हैं:
- संचित कर्म — अनेक जन्मों में संचित कर्मों का भंडार।
- प्रारब्ध कर्म — उन संचित कर्मों में से कुछ जो इस जन्म में फल देने के लिए चुने गए हैं।
- क्रियमाण कर्म — जो हम अभी इस जीवन में कर रहे हैं, और जो भविष्य में फल देंगे।
प्रारब्ध कर्म को भगवान स्वयं भी नहीं मिटाते, क्योंकि यह आत्मा के अनुभव और शिक्षा के लिए आवश्यक होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता (4.17) में कहा गया है —
“कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥”
— कर्म की गति अत्यंत गूढ़ है।
🔱 २. जब कोई हमें कष्ट देता है
अब सुनो, हे वत्स —
जब कोई हमें कष्ट पहुँचाता है, तो वह व्यक्ति हमारे प्रारब्ध का निमित्त (माध्यम) बनता है।
वेद और पुराणों में यह सिद्धांत बार-बार दोहराया गया है कि —
“कोई किसी को बिना उसके कर्म के कारण दुख नहीं दे सकता।”
जैसे —
- श्रीराम के जीवन में रावण का होना आवश्यक था ताकि श्रीराम का धर्मस्थापन कार्य पूर्ण हो।
- श्रीकृष्ण के जीवन में कंस और शकुनि का होना भी आवश्यक था ताकि लीला और धर्म का उद्घाटन हो सके।
इसलिए जब कोई हमें कष्ट देता है, वह केवल हमारे कर्मफल के वितरण में भगवान का साधन होता है।
परंतु यहाँ एक सूक्ष्म सत्य और है —
🌸 ३. जो कष्ट देता है, वह भी कर्म करता है
हे वत्स, यह मत समझो कि जो हमें कष्ट देता है वह निर्दोष है।
वह हमारे प्रारब्ध का निमित्त तो बनता है,
परंतु उसका इरादा, भाव और कर्म भी उसके लिए फल उत्पन्न करते हैं।
यदि वह किसी को अहंकार, ईर्ष्या या द्वेष से कष्ट देता है,
तो वह अपने लिए नया बुरा कर्म (क्रियमाण कर्म) बाँध लेता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण में कहा गया है —
“नैवात्मा परतन्त्रः स्यात्, स्वकर्मफलभोगवान्।”
— आत्मा कभी परतंत्र नहीं है; जो जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल भोगता है।
अतः,
- जिसे कष्ट मिला, वह अपना प्रारब्ध भोग रहा है।
- जिसने कष्ट दिया, वह अपने भाव के अनुसार नया कर्म बाँध रहा है।
🌼 ४. भगवान की दृष्टि में न्याय
भगवान का न्याय सदा पूर्ण होता है।
वह न किसी को अन्याय से दंड देते हैं,
न किसी को बिना कर्म के दुख देते हैं।
“नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।”
(गीता 5.15)
— परमात्मा किसी के पाप या पुण्य को अपने ऊपर नहीं लेते;
प्रत्येक प्राणी अपने कर्मों का ही अधिकारी होता है।
इसलिए जो व्यक्ति हमें दुख देता है, वह केवल लीला का पात्र है —
वास्तव में कष्ट हमारे कर्मों से ही उत्पन्न हुआ है।
🌷 ५. साधक के लिए संदेश
हे वत्स, सच्चे साधक के लिए यह समझ अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जब यह ज्ञात हो जाए कि “जो हुआ, वह मेरे ही कर्मों का फल है,”
तो मन में किसी के प्रति द्वेष नहीं रहता।
वही स्थिति “क्षमा” कहलाती है, और वही आत्मा को मुक्त करती है।
✨ उदाहरण
- राजा हरिश्चंद्र — अपने सत्य के कारण घोर कष्टों में पड़े;
पर उन्होंने किसी से द्वेष नहीं किया, क्योंकि वे जानते थे — यह मेरे कर्मों का फल है। - पांडवों ने भी दुःशासन और कौरवों के अन्याय को कर्मफल मानकर सहा,
इसलिए वे अंततः विजयी हुए।
🔶 निष्कर्ष:
🌺 “जो हमें कष्ट देता है, वह हमारे प्रारब्ध का माध्यम होता है,
परंतु उसका भाव उसके लिए कर्मफल का कारण बनता है।” 🌺
इसलिए ज्ञानी व्यक्ति किसी को दोष नहीं देता;
वह केवल भगवान का धन्यवाद करता है कि —
“प्रभु, आप मेरे कर्मों को समाप्त करने का मार्ग दे रहे हैं।”